मंगलवार, 12 अगस्त 2008

भारतीय डाक पर एक अनिवार्य सन्दर्भ ग्रन्थ

पुस्तक समीक्षा
भारतीय डाक : दुनिया में सबसे विश्वसनीय

देशराज शर्मा (sabhar indian postman)
दुनिया में सबसे उन्नत मानी जानेवाली भारतीय डाक व्यवस्था का संगठित स्वरूप भी 500 साल पुराना है। एकीकृत व्यवस्था के तहत ही भारतीय डाक डेढ़ सदी से ज्यादा लंबा सफर तय कर चुकी है। कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद आज भी डाक घर ही ग्रामीण भारत की धड़कन बने हैं। आजादी के समय भारत में महज 23334 डाक घर थे,पर उनकी संख्या एक लाख 55 हजार पार कर चुकी है। डाक घरों की भूमिकाएं भी समय के साथ बदल रही हैं। इसी नाते भारतीय डाक प्रणाली दुनिया के तमाम विकसित देशों से कहीं अधिक विश्वसनीय और बेहतर बन चुकी है। आजादी मिलने के बाद स्व.रफी अहमद िकदवई के संचार मंत्री काल में भारतीय डाक तंत्र के मजबूत विकास की रूपरेखा बनी और लगातार समर्थन ने इसे बहुत मजबूत बनाया। इसी नाते भारत के दूर देहात में डाक घरों की सुगम पहुंच बन सकी हमारे 89 फीसदी डाक घर देहातों में ही स्थित हैं। इसी तरह सेना डाक घरों का भी अपना विशेष महत्व है क्योंfक इनकी गति दुनिया में सबसे तेज है। भारतीय डाक -सदिओं का सफरनामा पुस्तक में डाक प्रणाली के साथ परिवहन प्रणाली का भी रोचक व्यौरा है। जानेमाने लेखक एवं पत्रकार अरविन्द kumar सिंह ने भारतीय डाक प्रणाली का आकलन मौर्य काल से आधुनिक इंटरनेट युग तक किया गया गया है। नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक तमाम रोचक और अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालती है। करीब डेढ़ दशक तक अनुसंधान के बाद श्री सिंह ने यह पुस्तक लिखी और इसे उन हजारों डाकियों को समर्पित किया है ,जिनके नन्हे पांव सदियों से संचार का सबसे बड़ा साधन रहे हैं।
किसी भी देश के आर्थिक सामाजिक और संस्कृति के विकास में डाक विभाग की भी अपनी अहम भूमिका होती है। यही कारण है िक इसे भी सड़क ,रेल और फोन की तरह आधारभूत ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। भारत में 1995 के आसपास मोबाइल के चलते संचार क्रांति का जो नया दौर शुरू हुआ,उसका विस्तार बहुत तेजी से हुआ। उसके बाद खास तौर पर शहरी इलाको मे यह आम मान्यता हो गयी िक अब डाक सेवाओं और विशेषकर पत्रों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। पर वास्तविकता यह है िक संचार क्रांति मुख्य रूप से शहरी इलाको तक ही सीमित है। देश के 70 फीसदी लोग आज भी ग्रामीण इलाको में रहते हैं और यहां आज भी लोगों के लिए आपसी संपर्क का साधन पत्र हैं। तमाम नयी प्रौद्योगिकी के आने के बावजूद डाक ही देहात का सबसे प्रभावी और विश्वसनीय संचार माध्यम बना हुआ है।
जब भारत को आजादी मिली थी तो यहां कुल टेलीफोनों की संख्या 80 हजार थी और 34 सालों में 20.5 लाख टेलीफोन लग पाए थे। पर अब हर माह लाखों नए फोन लग रहे है। फिर भी संचार के नए साधनो के तेजी से विस्तार के बावजूद पत्रों का अपनी जगह महत्व बना हुआ हैं। आज भी हर साल करीब ९०० करोड़ पत्र भारतीय डाक विभाग दरवाजे-दरवाजे तक पहुंचा रहा है। कूरियर और ईमेल से जानेवाले पत्र अलग हैं। 1985 में जब डाक और तार विभाग अलग किया गया था तब सालाना 1198 करोड़ पत्रों की आवाजाही थी। आज भी वैकल्पिक साधनों के विकास के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में पत्रों का आना -जाना भारतीय डाक प्रणाली के महत्व और उसकी सामाजिक को दर्शाने के लिए काफी है।
पर चुनौतियों से जुड़ा दूसरा पहलू भी गौर करनेवाला है। दुनिया भर में डाक घरों की भूमिका में बदलाव आ रहे हैं। इलेक्ट्रानिक मेल और नयी प्रौद्योगिकी परंपरागत डाक कार्यकलापों का पूरक बन रही है। मोबाइल और स्थिर फोन,यातायात के तेज साधन,इंटरनेट और तमाम माध्यमों से पत्र प्रभावित हुए है। पर दुनिया में पत्रों पर सर्वाधिक प्रभाव टेलीफोनो ने डाला। भारत में इसका प्रभाव खास तौर पर महानगरों में ही देखने को मिल रहा है। पर यह गौर क रने की बात है िक शहरी इलाको में व्यावसायिक डाक लगातार बढ़ रही है। इसका खास वजह यह है िक टेलीमार्केटिंग की तुलना में पत्र व्यवसाय बढ़ाने में अधिक विश्वसनीय तथा मददगार साबित हो रहे हैं।
भारतीय डाक प्रणाली का आजादी के बाद ही असली विस्तार हुआ। इस दौरान हमारी डाक प्रणाली का विस्तार सात गुना से ज्यादा हुआ है। डाक विभाग 38 सेवाऐं प्रदान की जा रही हैं,जिनमें से ज्यादातर घाटे में हैं। फिर भी यह विभाग एक विराट सामाजिक भूमिका निभा रहा है। यही नहीं भारतीय डाक प्रणाली आज दुनिया की सबसे विश्वसनीय और अमेरिका ,चीन,बेल्जियम और ब्रिटेन से भी बेहतर प्रणाली साबित हो चुकी है।
अरविंद कुमार सिंह ने अपनी पुस्तक में मौर्य काल की पुरानी डाक व्यवस्था से लेकर रजवाड़ों की डाक प्रणाली, पैदल, घोड़ा -गाड़ी, नाव और पालकी से लेक र ऊंटों तक का उपयोग कर डाक ढ़ोने की व्यवस्था जैसे तमाम रोचक और प्रामाणिक तथ्य हमें अतीत में ले जाते हैं। 1 अक्तूबर 1854 ·को डाक महानिदेशक के नियंत्रण में डाक विभाग के गठन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ,डाक अधिनियम ,ब्रिटिश डाक प्रणाली के विकास और विस्तार के पीछे के कारण और अन्य तथ्यों को शामिल करके इसे काफी रोचक पुस्तक बना दिया गया है। 1857 और उसके बाद के आजादी के आंदोलनो में डाक क र्मचारियों की ऐतिहासिक भूमिका को भी इस पुस्तक के एक खंड में विशेष तौर पर दर्शाया गया है। डाक कर्मचारी भी आजादी के आंदोलन में अग्रणी भूमिका में थे और स्वतंत्रता सेनानियों के संदेशों के आदान प्रदान में भी कई ने बहुत जोखिम लिया। मगर दुर्भाग्य से इस तथ्य की अनदेखी सभी ने की ।
डाक विभाग ने केवल पत्रों को ही नहीं पहुंचाया। मलेरिया नियंत्रण तथा प्लेग की महामारी रोकने मे भी डाक विभाग की ऐतिहासिक भूमिका रही है। ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह के दौरान देहात तक नमक पहुंचाने में डाक विभाग की भूमिका काफी दिलचस्प तरीके से दर्शायी गयी है। शुरू से ही भारतीय डाक बहुआयामी भूमिका में रहा है तथा बहुत कम लोग जानते हैं िक डाक बंगलों, सरायों तथा सड़को के रख रखाव का काम लंबे समय तक डाक विभाग ही करता था। इन पर लंबे समय तक डाक विभाग का ही नियंत्रण था। डाक घरों से पहले कोई भी मुसाफिर डाक ले जानेवाली गाड़ी,पालकी या घोड़ा गाड़ी आदि में अग्रिम सूचना देकर अपनी जगह बुक करा सकता था । इसी तरह रास्ते में पडऩेवाली डाक चौ·िकयों में (जो बाद में डा· बंगला कहलायीं) वह रात्रि विश्राम भी कर सकता था। यानि यह विभाग यात्राओं में भी सहायक बनता था। पुस्तक में भारतीय डाक प्रणाली के प्राण पोस्टमैन यानि डाक किए पर बहुत ही रोचक अध्याय है। डाकिया की भूमिका भले ही समय के साथ बदलती रही हो पर उसकी प्रतिष्ठा तथा समाज में अलग हैसियत बरकरार है। इसी नाते वे भारतीय जनमानस में रच- बस गए हैं। डाकियों पर तमाम गीत-लोक गीत और फिल्में बनी हैं। भारतीय डाक प्रणाली की जो गुडविल है,उसमें डाकियों का ही सबसे बड़ा योगदान है। आज भी वे साइकिल पर या पैदल सफर क रते हैं। एक जमाने मे तो वे खतरनाक जंगली रास्तों से गुजरते थे और अपने जीवन की आहूति भी देते थे। कई बार डाकियों या हरकारों को कर्तव्यपालन के दौरान शेर या अन्य जंगली जानवरों ने खा लिया, तमाम खतरनाक जहरीले सांपों की चपेट में आकर मर गए। कई प्राकृतिक आपदाओं और दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों में शिकार बने तो तमाम चोरों और डाकुओं का मुकाबला करते हुए लोक कथाओं का हिस्सा बन गए।
पुस्तक में पोस्टकार्ड ,मनीआर्र्डर, स्पीड पोस्ट सेवा ,डाक जीवन बीमा जैसी लोक प्रिय सेवाओं पर विशेष अध्याय हैं। इसके साथ ही डाक घर बचत बैक की बेहद अहम भूमिका पर भी एक खास खंड है। डाक घर बचत बैंक भारत का सबसे पुराना,भरोसेमंद और सबसे बड़ा बैंक है। इसी तरह पुस्तक में डाक टिकटो की प्रेरक ,शिक्षाप्रद और मनोहारी दुनिया पर भी विस्तार से रोशनी डाली गयी है। विदेशी डाक तथा दुनिया के साथ भारतीय डाक तंत्र के रिश्तो पर भी अलग से रोशनी डाली गयी है। इसी तरह भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए डाक विभाग द्वारा शुरू की गयी नयी सेवाओं,आधुनिकीरण के प्रयास,डाक विभाग को नयी दिशा देने की कोशिश समेत सभी प्रमुख पहलुओं को इस पुस्तक में शामिल कर काफी उपयोगी बना दिया गया है।
भारतीय डाक विभाग ने खास तौर पर देहाती और दुर्गम इलाको में साक्षरता अभियान तथा समाचारपत्रों को ऐतिहासिक मदद भी पहुंचायी है। रेडियो लाइसेंस प्रणाली डाक विभाग की मदद से ही लागू हुई थी और लंबे समय तक रेडियो को राजस्व दिलाने का यही प्रमुख स्त्रोत रहा । इसी तरह रेडियो के विकास में भी डाक विभाग का अहम योगदान रहा है। एक अरसे से मुद्रित पुस्तको और समाचार पत्रों को दुर्गम देहाती इलाको तक पहुंचा कर भारतीय डाक ने ग्रामीण विकास में बहुत योगदान दिया । वीपीपी (वैल्यू पेयेबल सिस्टम) से लोगों में किताब मंगाने और पढऩे की आदत विकसित हुई। गांव के लाखों अनपढ़ लोगों को पत्रों और पोस्टमैन ने साक्षर बनने की प्रेरणी दी । तमाम आपदाओं के मौके पर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और मुख्यमंत्री राहत कोषों को भेजे जानेवाले मनीआर्डर और पत्रों को बिना भुगतान के भेजने से लेकर तमाम ऐतिहासिक सेवाऐ डाकघरों ने प्रदान की हैं।
इस पुस्तक में डाक प्रणाली के विस्तृत इतिहास के साथ जिला डाक और राजाओं महाराजाओं की डाक व्यवस्था, आधुनिक डाक घरों, देहाती डाक खानो, पोस्टमैन, पोस्टकार्ड ,लेटरबाक्स आदि पर अलग से खंड हैं। डाक प्रणाली के विकास में परिवहन के साधनों के विकास का भी अपना महत्व रहा है। इस नाते भारतीय हरकारो , कबूतरों, हाथी -घोड़ा तथा पालकी , डाक बंगलों,रेलवे डाक सेवा, हवाई डाक सेवा पर भी अलग से खंड हैं। इसी के साथ भारतीय डाक टिकटों की मनोहारी दुनिया, पािकस्तान पोस्ट, विदेशी डाक प्रबंधन, डाक जीवन बीमा, करोड़ो पत्रों का प्रबंधन,पत्रों की अनूठी दुनिया, रेडियो लाइसेंस, मीडिया के विकास में डाक का योगदान,डेड लेटर आफिस के कार्यकरण पर भी पुस्तक में काफी रोशनी डाली गयी है।
पुस्तक में एक रोचक अध्याय उन डाक कर्मचारियों पर है जिन्होने समाज में लेखन ,कला या अन्य कार्यों से अपनी खास जगह बनायी। कम ही लोग जानते हैं िक नोबुल पुरस्कार विजेता सीवी रमण,मुंशी प्रेमचंद, अक्कीलन,राजिंदर सिंह बेदी, देवानंद, नीरद सी चौधरी, महाश्वेता देवी ,दीनबंधु मित्र, मशहूर डोगरी लेखक , शिवनाथ से लेकर कृष्णविहारी नूर जैसी सैकड़ो हस्तियां डाक विभाग के आंगन में ही पुष्पित पल्लवित हुईं। ये सभी डाक विभाग में कर्मचारी या अधिकारी रहे हैं। संचार क्रांति की चुनौतियों से मुकाबले के लिए डाक विभाग की तैयारी भी अलग से चल रही है। इसी के तहत व्यवसाय विकास निदेशालय के कार्यकरण , स्पीड पोस्ट तथा अन्य अत्याधुनिक उत्पादों का विवरण आदि पर भी पुस्तक विशेष गौर करती है।
पुस्तक में भारतीय सेना डाक सेवा पर भी काफी रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। टेलीफोन, मोबाइल या ईमेल सैनिको को अपने प्रियजनो के हाथ से लिखी पाती जैसा सुख- संतोष दे ही नहीं सकते । घर-परिवार से आया पत्र जवान को जो संबल देता है, वह काम कोई और नहीं कर सकता। माहौल कैसा भी हो,सैनिको को तो मोरचे पर ही तैनात रहना पड़ता है,ऐसे में पत्र उसका मनोबल बनाए रखने में सबसे ज्यादा मददगार होते हैं। इसी नाते सेना के डाकघरों का बहुत महत्व है। करीब सारे महत्वपूर्ण पक्षों और तथ्यों को समेट कर भारतीय डाक प्रणाली पर यह पुस्तक वास्तव में एक संदर्भ ग्रंथ बन गयी है। संचार और सूचना मामले में दिलचस्पी रखनेवालो और सभी प्रबुद्ध लोगों को यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए .

भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा लेखक -अरविंद के . सिंह , प्रकाशक -नेशनल बुक ट्रस्ट ,इंडिया ए-5 ग्रीन पार्क ,नयी दिल्ली.मूल्य-125 रूपए,पेज -416

1 टिप्पणी:

सजीव सारथी ने कहा…

नए चिट्टे की बधाई, निरंतर सक्रिय लेखन से हिन्दी ब्लॉग्गिंग को समृद्ध करें
आपका मित्र
सजीव सारथी